उत्तम नगर के पास जली बस्ती : किसका विकास, किसका विनाश?

दिल्ली के उत्तम नगर से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर बिंदापुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत मंसाराम पार्क की बस्ती में 11 तारीख की रात करीब 11:40 बजे आग लग गई या लगा दी गई। इस आग में लगभग 500 झुग्गियां जलकर राख हो गईं। बच्चों की किताब-कॉपियां, पैसे, बर्तन और घर का सारा सामान जल गया। कई बच्चों के पास तो तन पर पहने कपड़ों के अलावा कुछ भी नहीं बचा।

यह बस्ती करीब 25 साल पुरानी है। यहां समाज के हाशिये पर जीवनयापन करने वाले डोम, पासवान, धानुक और रविदास जैसी जातियों के लोग रहते हैं। कुछ महतो परिवार भी यहां बसे हुए हैं। ये सभी लोग बिहार से आए हैं, जिनमें से लगभग 95 प्रतिशत पटना, नालंदा और बाढ़ जिलों के रहने वाले हैं।

ये वे लोग हैं जिन्हें भारत के तथाकथित ‘सभ्य समाज’ में अक्सर ‘गंदा’ कहा जाता है, क्योंकि वे दूसरों के घरों से कूड़ा उठाकर अपने घरों में लाते हैं और उसी के बीच अपनी आजीविका चलाते हैं। उसी कूड़े के बीच उनके बच्चों की परवरिश होती है। उनके बच्चों के खिलौने भी कई बार उसी कूड़े में आए टूटे-फूटे खिलौने होते हैं।

यह बस्ती लगभग 7.5 हेक्टेयर जमीन पर फैली हुई है। इसके पास कुछ और खाली जमीन पड़ी है, जो लगभग 3-4 हेक्टेयर के आसपास होगी। एक ओर साफ-सुथरी और व्यवस्थित कॉलोनियां हैं और दूसरी ओर यह बस्ती। दोनों के बीच लगभग 40 फीट चौड़ी सड़क है, जिस पर सप्ताह में दो दिन बाजार लगता है। वहीं मछली बाजार रोज लगता है, जहां आसपास के लोग खरीदारी करने आते हैं। मछली और मुर्गा बेचने वाले कई लोग भी इसी बस्ती में रहते हैं।

मध्यम वर्ग की एक आम धारणा यह होती है कि हम टैक्स देते हैं और बस्ती में रहने वाले लोग हमारे टैक्स के पैसों पर मुफ्त में रहते हैं। यह भी कहा जाता है कि हमारे टैक्स के पैसों से उन्हें बिजली और पानी मुफ्त दिया जाता है। लेकिन सच्चाई जानकर शायद बहुत से लोग चौंक जाएंगे।

इस बस्ती के लोग हर महीने 10 से 20 हजार रुपये तक किराया देते हैं जय किशन और उनके भाई सतीश को। जय किशन को स्थानीय लोग एक राजनीतिक व्यक्ति बताते हैं। इसके बावजूद बस्ती के लोगों को न तो नियमित पानी मिल रहा है और न ही बिजली। यहां छह महीने से पानी नहीं आ रहा है और तीन महीने से बिजली भी काट दी गई है।

इन हालात में लोग अंधेरे में मोमबत्ती जलाकर अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं, मानो उनकी जिंदगी भी उसी मोमबत्ती की तरह धीरे-धीरे गल रही हो। मोमबत्ती की रोशनी बस इतनी होती है कि किसी तरह खाना बना लिया जाए और खा लिया जाए। उस रोशनी में बच्चों के पढ़ने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। विडंबना यह है कि इतनी मामूली रोशनी के लिए भी ये लोग हम और आप से ज्यादा पैसे खर्च करते हैं।

सरकार को शायद लगता होगा कि जिनकी जिंदगी में पहले से अंधेरा है, उन्हें रोशनी देने की क्या जरूरत है। आखिर उनके घर कोई महल तो नहीं हैं जो रोशनी से जगमगाएं। शायद अंधेरा रहने से यह भी ठीक रहता है कि सड़क के दूसरी तरफ द्वारका सेक्टर-3 में आने-जाने वाले लोग यह न देख लें कि यहां प्लास्टिक और बांस-बल्ली से बने घरों में भी इंसान रहते हैं।

दरअसल इन लोगों को पप्पू, उदय, चंद्रजीत या प्रतिमा जैसे नामों से नहीं जाना जाता। इन्हें बस ‘कबाड़ी वाले’ कहा जाता है। जैसे इनके बच्चों का भविष्य भी पहले से तय कर दिया गया हो कि इन्हें पढ़ने की जरूरत नहीं, इन्हें तो कबाड़ ही चुनना है! आखिर अगर ये पढ़-लिख गए तो कबाड़ कौन चुनेगा? शायद यही सोच उन अधिकारियों और नेताओं की भी रही होगी जिन्होंने इन लोगों के जीवन के बुनियादी साधन- पानी और बिजली छीन लिए।

करीब दस साल पहले भी इस बस्ती में आग लगी थी। उस समय कुछ ही घर जले थे और बस्ती भी इतनी बड़ी नहीं थी। बस्ती एक गड्ढेनुमा जगह पर थी। उस समय वहां कुछ पेड़ भी थे, जो लोगों को छाया देते थे। आसपास बिल्डिंग मैटेरियल की कुछ दुकानें भी थीं। अब वे दुकानें नहीं हैं और उनकी जगह भी झुग्गियां बन गई हैं।

जो गड्ढा बरसात के मौसम में पानी से भर जाता था, उसे यहां रहने वाले लोगों ने अपनी मेहनत और कमाई से भरकर करीब पांच फीट ऊंचा कर दिया। यानी जिस जमीन को रहने लायक बनाया, आज उसी जमीन से उन्हें हटाया जा रहा है। दूसरों के घरों से कूड़ा उठाकर अपनी जीविका चलाने वाले ये लोग आज ‘गंदे’ कहे जाने लगे हैं।

जब हम इस बस्ती में पहुंचे तो दोपहर का करीब एक बज रहा था, लेकिन वहां के कई लोगों ने सुबह से कुछ नहीं खाया था। कुछ लोग खाना पहुंचाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन स्थानीय लोगों के एक समूह ने उन्हें खाना और पानी देने से रोक दिया। 14 मार्च 2026 की दोपहर तक भी कोई भोजन नहीं पहुंचा था। कुछ लोग कपड़े बांट रहे थे, जिन्हें महिलाएं ले रही थीं।

बस्ती वालों की जुबानी

हमारी सबसे पहली मुलाकात पर्वतिया देवी से हुई। उनकी झुग्गी और आसपास की कुछ झुग्गियां आग से बच गई थीं। रविदास समुदाय से आने वाली पर्वतिया देवी पटना की रहने वाली हैं। वे अपना सामान- बांस-बल्ली आदि ट्रक में भरकर दूसरी जगह ले जा रही थीं। गुस्से में वे गालियां देते हुए कह रही थीं कि अब हम इन्हें गंदे लगते हैं। जब इनके घरों का कूड़ा सड़ता है और हम उसे उठाकर लाते हैं, तब इन्हें गंदगी नहीं लगती।

वे बताती हैं कि वे हर महीने 15 हजार रुपये किराया देती थीं जय किशन और उनके भाई सतीश को। उनके अनुसार यहां छह महीने से पानी नहीं आ रहा है और तीन महीने से बिजली भी काट दी गई है। वे मीडिया से भी नाराज थीं, क्योंकि कुछ लोग कह रहे थे कि आग बिजली से लगी है। उनका सवाल था जब यहां बिजली ही नहीं है, तो बिजली से आग कैसे लग सकती है? पर्वतिया देवी के अनुसार इस आग से तीन दिन पहले भी एक कोने में आग लगी थी, जहां जय किशन की बहन की कोठी है। लेकिन उस समय ज्यादा झुग्गियां नहीं जली थीं।

थोड़ा आगे बढ़ने पर जली हुई झुग्गियों के ढेर दिखाई देने लगे, जहां हमारी मुलाकात प्रतिमा देवी से हुई। वे नालंदा जिले की रहने वाली हैं और पासवान समुदाय से आती हैं। वे भी बताती हैं कि छह महीने से पानी नहीं आ रहा और तीन महीने से बिजली बंद है। पीने का पानी उन्हें दूर-दूर से लाकर काम चलाना पड़ता है।

उनकी बेटी आठवीं कक्षा की परीक्षा दे रही है, लेकिन उसकी किताब-कॉपियां आग में जल चुकी हैं। घर का सारा सामान भी नष्ट हो गया है। उनके अनुसार करीब दो लाख रुपये का नुकसान हुआ है। वे हर महीने 20 हजार रुपये किराया देती थीं और समय पर किराया नहीं देने पर गाली-गलौज भी सुननी पड़ती थी।

नालंदा के रहने वाले 26 वर्षीय सोनू पासवान बताते हैं कि उनके पिता यहां लंबे समय से रह रहे हैं। उनके अनुसार आम आदमी पार्टी के नेता रमेश मटियाला आए थे और कुछ मदद की। पार्षद अशोक शर्मा भी आए, लेकिन वे केवल आग के बारे में पूछकर चले गए। विधायक संदीप सेहरावत अब तक नहीं आए। जमीन मालिक के रूप में किराया लेने वाले जय किशन भी अब तक यहां नहीं पहुंचे।

29 वर्षीय पप्पू पासवान, जो बाढ़ (बिहार) के रहने वाले हैं, बताते हैं कि आग में उनका सिर जल गया है और वे निजी डॉक्टर से इलाज करवा रहे हैं।

वहीं खड़े एक व्यक्ति बताते हैं कि जल बोर्ड के अधिकारी कहते हैं कि यहां पानी पहुंचाने की जगह ही नहीं है। पहले (केजरीवाल सरकार में) सप्ताह में 10–12 टैंकर पानी आता था। कुछ लोग बताते हैं कि पुलिस भी समय-समय पर आकर जगह खाली करने की धमकी देती रहती है। वे कहते हैं कि अगर लोग कूड़ा नहीं उठाएं तो दिल्ली बदबू से भर जाएगी। हम घरों से कूड़ा उठाकर लाते हैं और यहां हमें ही गंदा कहा जाता है।

25 साल से यहां रहने वाले आशु, जिनका चेहरा आग में झुलस गया है, सवाल उठाते हैं — “दीवाली में जब पटाखे फूटते हैं तब आग नहीं लगती, लेकिन यहां अचानक इतनी बड़ी आग कैसे लग गई?” उनका कहना है कि यह आग लगाई गई है। आशु आगे कहते हैं कि कांग्रेस के शासन में यहां कोई दिक्कत नहीं हुई, आम आदमी पार्टी के शासन में भी ज्यादा परेशानी नहीं थी। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। वे कहते हैं कि प्रधानमंत्री कहते हैं “जहां झुग्गी, वहां मकान”, लेकिन यहां लोगों को भगा रहे हैं।

उदय पासवान बताते हैं कि पेट्रोल छिड़ककर आग लगाई गई। दमकल की गाड़ियां लगभग दो घंटे बाद पहुंचीं, जब तक सब कुछ जल चुका था। वे बताते हैं कि उनका एक लाख रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। वे द्वारका सेक्टर-12 और 13 में लगभग 50-60 घरों से कूड़ा उठाते हैं, जिससे उन्हें करीब 1000 रुपये महीने मिलते हैं। इसके बावजूद वे यहां 10 हजार रुपये किराया देते थे। उनका कहना है कि इस बस्ती से हर महीने कम से कम 10 लाख रुपये किराया वसूला जाता है। उनके चार बच्चे हैं, जो बस्ती में चलने वाले एक एनजीओ के स्कूल में पढ़ते हैं।

दीपक, जो बरौनी के रहने वाले हैं और करीब 25 साल से यहां रह रहे हैं, बताते हैं कि करीब पांच साल पहले यह जगह बरसात के मौसम में पानी से लबालब भर जाती थी। यहां लोगों ने मलबा गिराकर और मेहनत करके जमीन को रहने लायक बनाया। वे बताते हैं कि आम आदमी पार्टी की सरकार के समय यहां कुछ सुविधाएं थीं, लेकिन अब हालत यह है कि लोग द्वारका सेक्टर 1 और मटियाला से पानी लाकर काम चला रहे हैं।

एक और व्यक्ति बताते हैं कि वे राजापुरी कॉलोनी से कूड़ा उठाने का काम करते हैं। वे लगभग 250 घरों का कूड़ा उठाते हैं, जिसके बदले उन्हें 2500 रुपये मिलते हैं। इसके बावजूद वे यहां 16 हजार रुपये महीना किराया देते हैं। उनके दो बच्चे हैं। वे बताते हैं कि जब सब कुछ जल चुका था, तब जाकर दमकल की गाड़ी आई।

यहाँ पर बजरंग दल के कुछ कार्यकर्ता भी आए थे, जो इस आश्वासन पर कि वे बच्चों के पेपर के बाद  चले जाएंगे, तब तक  पानी मुहैया कराने की बात फोन पर कर रहे थे। वे इस जमीन को प्राइवेट लैंड बता रहे थे

सवाल जो अब भी बाकी हैं

अब कहा जा रहा है कि इस बस्ती को खाली करने का नोटिस एमसीडी से आया था। कुछ लोग कहते हैं कि नोटिस आया था, जबकि कई लोग कहते हैं कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी।

अगर जमीन सरकारी थी, तो इतने वर्षों तक जय किशन और उनके परिवार द्वारा किराया किस आधार पर लिया जा रहा था?

द्वारका सेक्टर-3 के पास स्थित इस इलाके में, जहां कई बड़े संस्थान मौजूद हैं, यह लगभग 10 हेक्टेयर जमीन आखिर किसकी है? जमीन के विवाद में गरीबों का घर कैसे जल गया?

क्या इस आग में किसी की जान भी जा सकती थी, जैसे हाल ही में रिठाला में आग की घटना में एक महिला की मौत हो गई थी?

“जहां झुग्गी, वहां मकान” का नारा देने वाली सरकारें आज इन बस्तीवासियों को पानी और बिजली से क्यों वंचित रखे हुए हैं?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आग लगने के बाद भी सरकार ने मानवीय सहायता जैसे- टेंट, दवा, खाना और पानी क्यों उपलब्ध नहीं कराया? वे कौन लोग हैं जो दूसरों को मदद करने से रोक रहे हैं? और पुलिस प्रशासन किसके कहने पर बस्तीवासियों को धमका रहा है?

चुनाव के समय विकास के वादे करने वाले पार्षद, विधायक और सांसद आज कहां हैं? क्या ये लोग इस देश की जनता नहीं हैं?

क्या यहां सरकार, अधिकारी और ‘जमीन मालिक’ की मिलीभगत है? पहले कब्जा बनाए रखने के लिए बस्ती बसाई गई, किराया वसूला गया और आज उसी जमीन पर कब्जे की लड़ाई में बस्ती वालों की बलि ली जा रही है?

इस आग ने सिर्फ 500 झुग्गियों को नहीं जलाया बल्कि उस उम्मीद को जला दी है जो लोग गाँव से लेकर शहर को आते हैं। यह उस विकास मॉडल पर भी सवाल खड़े करती है जिसमें शहर चमकाने की बात होती है, और ‘सबका साथ सबका विकास’ की बात करती है। बस्तीवासियों को मुआवजा मिलना चाहिए और उनका पुनर्वास यहीं किया जाना चाहिए।

(सुनील कुमार वरिष्ठ पत्रकार, शोधकर्ता हैं।)

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